पत्रकारिता का बोझ मैदान में खड़े रिपोर्टर पर मत डालिए!

पत्रकारिता का बोझ मैदान में खड़े रिपोर्टर पर मत डालिए Mob-lynching-Dev-kotak-times-now

डॉ तरुणा एस गौड़

 “मैंने बहुत आक्रोश में लिखा है, और मैं अपने हर शब्द की जिम्मेदारी लेती हूँ।”

पत्रकारिता के बड़े आइकन द्वारा लोकप्रिय बनाया गया एक शब्द गोदी मीडिया” आज केवल एक राजनीतिक विशेषण नहीं रह गया है। मुझे लगता है कि इसका सबसे बड़ा बोझ आज मैदान में रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार उठा रहे हैं।

गलत उनके साथ पहले भी होता था। पत्रकारों पर हमले पहले भी होते थे। लेकिन अब उनकी विश्वसनीयता (Credibility) पर ही सवाल खड़ा कर दिया गया है। अब कई जगह रिपोर्टर को पहले पत्रकार नहीं, “गोदी मीडिया” कहकर देखा जाता है।

जंतर-मंतर पर Times Now के पत्रकार देव कोटक के साथ हुई घटना ने मुझे यह लिखने के लिए मजबूर किया। देव को जन्तर मंतर पर भीड़ ने मिलकर मारा अगर कुछ आन्दोलनकारी ह्युमन चेन बनाकर उन्हें नहीं निकालते तो वो उनका आखिरी दिन होता। उन्हें बुरी तरह पीटा गया, कपड़ फाड़ दिए गए, उनका सामान घड़ी मोबाईल छीन लिया गया, यहाँ तक कि वो रिक्वेस्ट करते रह गए कि वो बिना चश्मे नहीं देख सकते उनका चश्मा वापस देदो, लेकिन भीड़ निर्मम हो चुकी थी।

आज जब रिपोर्टरों को केवल उनके संस्थान के आधार पर निशाना बनाया जा रहा है, तो मुझे लगता है कि इस माहौल के निर्माण में गोदी मीडिया शब्द निर्माण भाषा और विमर्श की भी समीक्षा होनी चाहिए।

पत्रकारिता में बड़े पदों पर बैठे लोग भली-भाँति जानते हैं कि मैदान में काम करने वाला रिपोर्टर संपादकीय टीम के निर्देशों से बंधा होता है। वह धूप, बारिश, विरोध, हिंसा और जोखिम झेलते हुए तथ्य जुटाता है। जो देखता है, रिकॉर्ड करता है और न्यूज़रूम भेज देता है। उसके बाद उस सामग्री को किस तरह संपादित किया जाता है, किस एंगल से दिखाया जाता है या व्यावसायिक और संपादकीय निर्णय कैसे लिए जाते हैं—यह निर्णय अधिकांश मामलों में रिपोर्टर का नहीं होता।

गोदी मीडिया शब्द के जनक वर्षों तक एंकरों और चैनलों की आलोचना कर रहे थे, तब क्या यह भी उतनी ही स्पष्टता से नहीं कहा जाना चाहिए था कि हर रिपोर्टर बेईमान नहीं होता? कि हजारों ईमानदार रिपोर्टर भी हैं, जो अपनी नौकरी, परिवार और सीमित विकल्पों के बीच अपना पेशा निभा रहे हैं।

अगर हर असहमति का समाधान नौकरी छोड़ देना है, तो उन पत्रकारों के परिवारों की जिम्मेदारी कौन लेगा?

और एक सवाल उस जनता से भी है, जो आज “गोदी मीडिया” कहकर पत्रकारों को गालियाँ देती है, और कुछ मामलों में हिंसा तक उतर आती है।

क्या इसी जनता ने कभी उन पत्रकारों के लिए आवाज उठाई—

  • पवन जायसवाल, जिन्होंने मिड-डे मील में नमक-रोटी का सच उजागर किया और बाद में मुकदमों का सामना किया।
  • जगेन्द्र सिंह, जिन्होंने भ्रष्टाचार पर रिपोर्टिंग की और जिनकी मृत्यु आग से झुलसने के बाद हुई; इस मामले में गंभीर आरोप लगे और लंबे समय तक न्याय की मांग उठती रही।
  • संदीप कोठारी, जिनकी हत्या कर शव जला दिया गया क्योंकि वे कथित तौर पर खनन माफिया पर रिपोर्टिंग कर रहे थे।

जब पवन जायसवाल कैंसर की अंतिम अवस्था में इलाज के लिए आर्थिक सहायता की अपील कर रहे थे, तब पत्रकारिता की दुहाई देने वाली यह भीड़ कहाँ थी?

पत्रकारों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाना आसान है। लेकिन संकट की घड़ी में उनके साथ खड़ा होना कहीं अधिक कठिन।

हम किसी चैनल की संपादकीय नीति का बचाव नहीं कर रहे। हम केवल इतना कह रहे हैं कि न्यूज़रूम के निर्णयों का पूरा नैतिक और सामाजिक बोझ मैदान में खड़े उस रिपोर्टर पर मत डालिए, जो सम्पादकीय निति का जिम्मेदार ही नहीं है।

किसी पत्रकार की रिपोर्ट से असहमति हो सकती है। उसकी आलोचना भी हो सकती है। लेकिन यदि भाषा का ऐसा वातावरण बन जाए कि रिपोर्टर को केवल उसके संस्थान के कारण अपमानित या हिंसा का पात्र समझा जाने लगे, तो यह लोकतंत्र और पत्रकारिता—दोनों के लिए गंभीर चिंता का विषय है।

मारने का अधिकार किसी को नहीं है। लोकतंत्र में असहमति का उत्तर हिंसा नहीं, बल्कि तथ्य, तर्क और संवाद होना चाहिए।